व्यवहार के बारे में (ज्ञान और व्यवहार, जानने और कर्म करने के आपसी संबंध के बारे में) – माओ त्से–तुङ, जुलाई 1937

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जब हम इस मुद्दे पर पहुंच जाते हैं, तो क्या ज्ञानप्राप्ति की क्रिया पूरी हो जाती है ? हमारा उत्तर है : हो जाती है और नहीं भी होती। जब सामाजिक मनुष्य किसी वस्तुगत प्रक्रिया को, जो विकास की किसी मंजिल पर हो, बदलने के व्यवहार में लगता है (चाहे किसी प्राकृतिक प्रक्रिया को बदलने का व्यवहार हो अथवा सामाजिक प्रक्रिया को), तब वह अपने चिंतन में वस्तुगत प्रक्रिया के प्रतिबिंब द्वारा और अपनी मनोगत कार्रवाई के संचालन द्वारा अपने ज्ञान को इंद्रियग्राह्य से बुद्धिसंगत मंजिल तक बढ़ा सकता है, तथा ऐसे विचारों, सिद्धांतों, योजनाओं अथवा कार्यक्रमों का निर्माण कर सकता है जो मोटे तौर पर उस वस्तुगत प्रक्रिया के नियमों के अनुरूप हों। इसके बाद वह इन विचारों, सिद्धांतों, योजनाओं अथवा कार्यक्रमों को उसी वस्तुगत प्रक्रिया के अमल में लाता है। यदि वह अपना पूर्वकल्पित उद्देश्य प्राप्त कर ले, अर्थात यदि वह उसी प्रक्रिया के व्यवहार में उन पूर्वनिर्मित विचारों, सिद्धांतों, योजनाओं अथवा कार्यक्रमों को वास्तविकता का रूप दे डाले या मोटे तौर पर वास्तविकता का रूप दे डाले, तो यह माना जा सकता है कि इस ठोस प्रक्रिया के संबंध में ज्ञानप्राप्ति की क्रिया पूरी हो गई। उदाहरण के लिए प्रकृति को बदलने की प्रक्रिया में, किसी इंजीनियरी–योजना को अमली रूप देना, किसी वैज्ञानिक परिकल्पना की सच्चाई को सिद्ध करना; किसी औजार को बनाना अथवा किसी फसल की कटाई करना; और समाज को बदलने की प्रक्रिया में, किसी हड़ताल की जीत होना, किसी युद्ध में विजय प्राप्त होना अथवा किसी शिक्षा संबंधी योजना को पूरा करना-इन सभी को पूर्वकल्पित उद्देश्यों का सिद्ध होना माना जा सकता है। लेकिन साधारणत:, चाहे प्रकृति को बदलने के व्यवहार में हो चाहे समाज को, ऐसा बहुत कम होता है कि लोगों के मूल विचार, सिद्धांत, योजनाएं अथवा कार्यक्रम किसी न किसी परिवर्तन के बिना कार्यान्वित हो जाएं। यह इसलिए कि जो लोग वास्तविकता को बदलने मे लगे हुए हैं, उनकी बहुत सी सीमाएं होती हैं। उनकी सीमाएं वैज्ञानिक और तकनोलाजीकल परिथितियों से ही निश्चित नहीं होतीं, बल्कि इस बात से भी निश्चित होती हैं कि वस्तुगत प्रक्रिया का खुद किस हद तक विकास हुआ है और उसने किस हद तक अपने को प्रकट किया है (वस्तुगत प्रक्रिया के विभिन्न पहलू और उसका सारतत्व अभी पूर्ण रूप से प्रकट नहीं हुए)। ऐसी स्थिति में, व्यवहार के दौरान अप्रत्याशित परिस्थितियों की जानकारी होने पर विचार, सिद्धांत, योजनाएं अथवा कार्यक्रम अक्सर आंशिक रूप में और कभी–कभी पूरी तरह से भी बदल दिए जाते हैं। दूसरे शब्दों में होता यह है कि मूल विचार सिद्धांत, योजनाएं अथवा कार्यक्रम अंशत: या पूर्णत: वास्तविकता से मेल नहीं खाते, अथवा अंशत: या पूर्णत: गलत होते हैं। अक्सर ऐसा होता है कि गलत ज्ञान को ठीक करने से पहले गलत ज्ञान को बदलकर उसे वस्तुगत प्रक्रिया के नियमों के अनुकूल बनाने के पहले, और फलत: मनोगत चीजों को वस्तुगत चीजों में बदलने के पहले यानी व्यवहार में प्रत्याशित फल पाने के पहले, बार–बार असफलताओं का सामना करना ही पड़ता है। फिर भी इस मुद्दे पर पहुंचने के बाद, चाहे यह कैसे ही हुआ हो, यह समझा जाता है कि किसी वस्तुगत प्रक्रिया के बारे में, जो विकास की किसी एक मंजिल पर हो, मनुष्य की ज्ञानप्राप्ति की क्रिया पूरी हो गई है।

लेकिन जहां तक प्रक्रिया की प्रगति का ताल्लुक है, मनुष्य की ज्ञानप्राप्ति की क्रिया पूरी नहीं होती। कोई भी प्रक्रिया, चाहे वह प्राकृतिक जगत में हो अथवा सामाजिक जगत में, अपने अंदरूनी अंतरविरोधों और संघर्षों के कारण बढ़ती और विकसित होती है; उसी के अनुसार मनुष्य की ज्ञानप्राप्ति की क्रिया को भी बढ़ना और विकसित होना चाहिए। जहां तक सामाजिक आंदोलन का संबंध है, सच्चे क्रांतिकारी नेताओं को इस बात में माहिर हो जाना चाहिए कि जब भी उनके विचार, सिद्धांत, योजनाएं अथवा कार्यक्रम गलत साबित हों, तो जैसा कि हम बता चुके हैं, वे लोग उन्हें सुधार लें; यही नहीं, उन्हें इस बात में भी माहिर हो जाना चाहिए कि जब कोई वस्तुगत प्रक्रिया विकास की एक मंजिल से दूसरी मंजिल में पहुंच चुकी हो और परिवर्तित हो चुकी हो, तो उसके अनुसार वे खुद के और अपने साथी क्रांतिकारियों के मनोगत ज्ञान को आगे बढ़ाएं और परिवर्तित करें; दूसरे शब्दों में, उन्हें इस बात की गारन्टी कर देनी चाहिये कि उनके द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले नए क्रांतिकारी काम और नए अमली कार्यक्रम नई परिस्थिति के परिवर्तनों के अनुकूल हों। क्रांतिकारी काल में परिस्थिति बड़ी तेजी से बदलती है; यदि बदली हुई परिस्थिति के अनुकूल क्रांतिकारियों का ज्ञान भी तेजी से न बदले, तो वे क्रांति को विजय तक नहीं ले जा सकते।

लेकिन अक्सर होता यह है कि विचार वास्तविक स्थिति से पीछे रह जाते हैं; इसका कारण यह है कि मानव–ज्ञान बहुत सी सामाजिक परिस्थितियों की सीमा में बंधा रहता है। क्रांतिकारियों की पांतों में हम उन कट्टरतावादियों का विरोध करते हैं जिनके विचार बदलती हुई वस्तुगत परिस्थितियों के अनुसार आगे नहीं बढ़ पाते तथा इतिहास में दक्षिणपंथी अवसरवाद के रूप में प्रकट होते हैं। वे लोग यह नहीं देख पाते कि अंतरविरोधों का संघर्ष पहले ही वस्तुगत प्रक्रिया को आगे बढ़ा चुका है, जबकि उनका अपना ज्ञान पुरानी मंजिल पर ही रुक गया है। सभी कट्टरतावादियों के विचारों की यही विशेषता होती है। उनके विचार सामाजिक व्यवहार से अलग होते हैं, और वे समाज के रथचक्रों का पथ–प्रदर्शन नहीं कर सकते; वे केवल रथ के पीछे यह भुनभुनाते हुए घिसटते रहते हैं कि वह बहुत तेजी से बढ़ा जा रहा है, तथा उसे पीछे ढकेलने और उल्टी दिशा में ले जाने का प्रयत्न करते हैं।

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