व्यवहार के बारे में (ज्ञान और व्यवहार, जानने और कर्म करने के आपसी संबंध के बारे में) – माओ त्से–तुङ, जुलाई 1937

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वास्तविकता को बदलने के व्यवहार के आधार पर उत्पन्न होने वाली ज्ञानप्राप्ति की द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी क्रिया को-ज्ञानप्राप्ति की कदम–ब–कदम गंभीर होने वाली क्रिया को-स्पष्ट करने के लिए कुछ अन्य ठोस मिसालें नीचे दी जाती हैं।

पूंजीवादी समाज के बारे में सर्वहारा वर्ग का ज्ञान। अपने व्यवहार के पहले दौर में-मशीनें तोड़ने और स्वत:स्फूर्त संघर्षों के दौर में-सर्वहारा वर्ग अभी केवल इंद्रियग्राह्य ज्ञान की ही मंजिल में था; उसे अभी पूंजीवाद के विभिन्न रूपों के केवल कुछ ही पहलुओं और उनके बाह्य संबंधों का ही ज्ञान था। उस समय सर्वहारा वर्ग केवल “अपने स्वाभाविक रूप में स्थित वर्ग” था। लेकिन यह वर्ग जब अपने व्यवहार के दूसरे दौर में-जागरूक व संगठित रूप से चलने वाले आर्थिक संघर्ष और राजनीतिक संघर्ष के दौर में-पहुंचा, तो उसने अपने व्यवहार से, लंबे संघर्षों के अपने अनुभव से और मार्क्सवादी सिद्धांतों की, जिनका जन्म मार्क्स और एंगेल्स द्वारा वैज्ञानिक पद्धति से इन अनुभवों का सार ग्रहण करके हुआ था, शिक्षा से पूंजीवादी समाज के सारतत्व को समझा, विभिन्न सामाजिक वर्गों के शोषण–संबंधों और अपने ऐतिहासिक कर्तव्य को समझा, तथा इस प्रकार वह “अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील वर्ग” बना।

यही बात साम्राज्यवाद के बारे में चीनी जनता के ज्ञान पर भी लागू होती है। पहली मंजिल सतही इंद्रियग्राह्य ज्ञान की थीं, जैसा कि थाइफिङ स्वर्गिक–राज्य आंदोलन, ई हो थ्वान आंदोलन आदि के अंधाधुंध विदेश–विरोधी संघर्षों से प्रकट होता है। केवल दूसरी मंजिल में ही चीनी जनता बुद्धिसंगत ज्ञान की मंजिल में पहुंची, साम्राज्यवाद के आंतरिक और बाह्य अंतरविरोधों को देख सकी तथा इस असलियत को देख सकी कि चीन के दलाल–पूंजीपति वर्ग और सामंती वर्ग के सहयोग से साम्राज्यवाद ने चीन के व्यापक जन–समुदाय का शोषण व उत्पीड़न किया। इस तरह के ज्ञान का आरंभ 1919 के 4 मई आंदोलन के आसपास ही हुआ।

इसके बाद हम जरा युद्ध पर विचार करें। यदि युद्ध का संचालन करने वालों के पास युद्ध के अनुभव का अभाव है, तो वे आरंभिक मंजिल में एक विशेष युद्ध का (उदाहरण के लिए पिछले दस वर्षों का हमारा भूमि–क्रांति युद्ध) संचालन करने वाले गंभीर नियमों को नहीं समझ पाएंगे। आरंभिक मंजिल में उन्हें केवल लड़ाई के बहुत से अनुभव प्राप्त होते हैं और वे अनेक बार हारते हैं। लेकिन इस तरह के अनुभव से (जीती हुई लड़ाइयों और खासकर हारी हुई लड़ाइयों के अनुभव से) वे समूचे युद्ध के आंतरिक सूत्र को समझ जाते हैं, अर्थात उस विशेष युद्ध के नियमों को समझ जाते हैं, रणनीति और कार्यनीति को समझ जाते हैं और फलत: बड़े विश्वास के साथ युद्ध का संचालन करने लगते हैं। ऐसे समय में यदि किसी अनुभवहीन व्यक्ति को नायक बना दिया गया, तो वह भी तब तक युद्ध के सच्चे नियमों को नहीं समझ सकता जब तक कि कई बार हार न जाए (अनुभव न प्राप्त कर ले)।

किसी साथी को यदि कोई काम दिया जाता है और उसे स्वीकार करने का उसमें साहस नहीं होता, तो वह अक्सर यह कहता है, “मुझे भरोसा नहीं कि मैं यह काम कर सकूंगा”। उसे आखिर अपने पर भरोसा क्यों नहीं है ? इसलिए कि उसे इस तरह के काम की अंतर्वस्तु और परिस्थितियों की व्यवस्थित समझ नहीं है, अथवा इसलिए कि इस तरह के काम से उसका सम्पर्क बहुत थोड़ा रहा है, या रहा ही नहीं है, तथा इसलिए उसके नियम उसकी पहुंच के बाहर हैं। काम के स्वरूप और परिस्थितियों का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद उसे अपने पर अधिक भरोसा हो जाएगा, और वह उसे करने के लिए राजी हो जाएगा। कुछ समय तक काम करने के बाद उस व्यक्ति को यदि उस काम का अनुभव हो जाए, इसके अलावा यदि वह चीजों को खुले दिमाग से देखने को तैयार हो और समस्याओं पर मनोगत, एकांगी और सतही तरीके से विचार न करता हो, तो वह इस बारे में खुद ही परिणाम निकाल सकेगा कि काम कैसे करना चाहिए, तथा उसका साहस भी बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा। केवल ऐसे ही लोग, जो समस्याओं के प्रति मनोगत, एकांगी और सतही रुख अपनाते हैं, कहीं जाने के बाद वहां की परिस्थिति पर विचार किए बिना, वस्तुओं को समग्र रूप से (उनके समूचे इतिहास और उनकी समूची वर्तमान स्थिति की दृष्टि से) परखे बिना, तथा वस्तुओं के सारतत्व (उनके स्वरूप तथा एक वस्तु और दूसरी वस्तु के बीच के आंतरिक संबंधों) तक पहुंचे बिना ही बड़े आत्मसंतोष के साथ आज्ञाएं और निर्देश जारी करते हैं। ऐसे लोगों का ठोकर खाना और गिरना अनिवार्य है।

इस प्रकार ज्ञानप्राप्ति की प्रक्रिया में पहला कदम है बाह्य जगत की वस्तुओं से सम्पर्क; यह कदम इंद्रिय–संवेदन की मंजिल का कदम है। दूसरा कदम है इंद्रिय–संवेदन द्वारा प्राप्त सामग्री को पुनर्व्यवस्थित करके और उसकी पुनर्रचना करके उसका समन्वय करना; यह कदम धारणा, निर्णय और तर्क की मंजिल का कदम है। जब इंद्रिय–संवेदन की सामग्री बहुत समृद्ध होती है (आंशिक या अपूर्ण नहीं होती) और वास्तविकता के अनुकूल होती है (भ्रामक नहीं होती), सिर्फ तभी हम ऐसी सामग्री के आधार पर सही धारणाएं बना सकते हैं और सही तर्क पेश कर सकते हैं।

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