समाजवाद क्यों? – अल्बर्ट आइंस्टाइन (1949)

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क्या किसी ऐसे व्यक्ति के लिए समाजवाद के विषय पर विचार व्यक्त करना उचित है कि जो आर्थिक और सामाजिक मुद्दों का विशेषज्ञ नहीं है? मैं यह मानता हूँ कि अनेक कारणों की वजह से यह (उचित) है। हमें इस प्रश्न पर पहले वैज्ञानिक ज्ञान की दृष्टि से विचार करना चाहिए। ऐसा प्रकट हो सकता है कि खगोल विज्ञान और अर्थशास्त्र के बीच कोई प्रणाली संबंधी मौलिक अंतर नहीं है: वैज्ञानिक दोनों क्षेत्रों में तथ्यों के एक सीमित समूह के लिए सामान्य स्वीकार्यता के कानूनों को खोजने का प्रयास करते हैं ताकि वे इन तथ्यों के एक दूसरे के संबंध को संभव रूप से ज्यादा से ज्यादा स्पष्ट बना सकें।

लेकिन वास्तव में ऐसे प्रणाली संबंधी अंतर मौजूद हैं। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में सामान्य कानूनों की खोज उस हालत से मुश्किल बना दी जाती है जिस का मानना है कि आर्थिक तथ्य अक्सर उन बहुत से कारकों से प्रभावित होते हैं जिन का अलग से मूल्यांकन करना बहुत कठिन है। इसके अलावा, मानव इतिहास के तथाकथित सभ्य अवधि की शुरुआत से जमा किया गया अनुभव, जैसा कि अच्छी तरह से ज्ञात है, काफी हद तक उन कारणों से प्रभावित और सीमित किया गया है जो किसी भी तरह से प्रकृति में पूरी तरह से आर्थिक नहीं रहे हैं। उदाहरणतः इतिहास के प्रमुख राज्यों में से अक्सर अपने अस्तित्व के प्रति विजय के आभारी हैं। जीतने वाले लोगों ने, कानूनी और आर्थिक रूप से, स्वयं को विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के रूप में स्थापित किया। उन्हों ने खुद के लिए भूमि स्वामित्व का एकाधिकार जब्त कर लिया और अपने स्वयं के वर्गों के बीच से ही एक पुजारी नियुक्त किया।

पुजारियों ने, शिक्षा के नियंत्रण में, समाज के वर्ग विभाजन को एक स्थायी संस्था बना दिया और मूल्यों का एक ऐसा सिस्टम बनाया जिस के द्धारा लोग उस समय, एक बड़ी हद तक अनजाने में, अपने सामाजिक व्यवहार में निर्देशित किए गए। लेकिन ऐतिहासिक परंपरा, ऐसा कहना है, तो कल की बात है; कहीं भी नहीं हम वास्तव में उस चीज को हरा सके जिसे थोर्सटेन वेब्लेन (Thorstein Veblen) ने मानव विकास का “हिंसक चरण” कहा है। पालनीय आर्थिक तथ्यों का संबन्ध उसी चरण से है और इस तरह के कानून जैसा कि हम उन से प्राप्त कर सकते हैं वे अन्य चरणों में लागू होने योग्य नहीं हैं। क्योंकि समाजवाद का वास्तविक उद्देश्य निश्चित रूप से मानव विकास के हिंसक चरण को पराजित करना और उस से परे अग्रिम करना है, आर्थिक विज्ञान अपनी वर्तमान स्थिति में भविष्य के समाजवादी समाज पर थोड़ा प्रकाश डाल सकता है।

दूसरी बात, समाजवाद एक सामाजिक-नैतिक उद्धेश्य की ओर निर्देशित किया जाता है। विज्ञान, तथापि, उद्धेश्यों को बना नहीं सकता है, और इस से भी कम, मनुष्य के मन में उन्हें बैठा नहीं सकता; विज्ञान, ज्यादा से ज्यादा, कुछ उद्धेश्यों को प्राप्त करने का साधन आपूर्ति कर सकता है। लेकिन उद्धेश्य खुद उन हस्तियों द्धारा नियोजित किए जाते हैं जो बुलंद नैतिक आदर्शों वाले हैं और – अगर यह उद्धेश्य मृत पैदा हुए हैं, लेकिन महत्वपूर्ण और सशक्त हैं – वे उन बहुत से मनुष्यों द्धारा अपनाये और आगे बढ़ाए जाते हैं, जो नीम अनजाने में, समाज के धीमी विकास का निर्धारण करते हैं। इन्हीं कारणों के नाते, जब मानव समस्याओं का सवाल हो तो हमें विज्ञान और वैज्ञानिक तरीकों का वास्तविकता से अधिक समझने में सावधानी बरतनी चाहिए; और हमें यह नहीं मानना चाहिए कि विशेषज्ञ ही वे लोग हैं केवल जिन को समाज के संगठन को प्रभावित करने वाले सवालों पर खुद को अभिव्यक्त करने का अधिकार है।

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