गेब्रियल भ्रम

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गेब्रियल को यहूदी धर्म, इस्लाम, बहाई विश्वास, और अधिकांश ईसाईयों द्वारा प्रधान देवदूत (archangels) के रूप में पहचाना जाता है । कुछ प्रोटेस्टेंट माइकल को एकमात्र महादूत होने का मानते हैं । गैब्रियल, माइकल और राफेल को रोमन कैथोलिक चर्च में पूजा की जाती है । इस्लाम में नामित आर्कांगल्स/प्रधान देवदूत गेब्रियल/जिब्राइल(Gabriel/Jibra’il), माइकल(Michael), इस्राफिल(Israfil) और अज़राइल(Azrael) हैं । यहूदी साहित्य, जैसे कि “एनोक की किताब(Book of Enoch),” मेटाट्रॉन(Metatron) को एक महादूत(archangel) के  भी उल्लेख करती है, जिसे “स्वर्गदूतों का सर्वोच्च(highest of the angels)” कहा जाता है, हालांकि इस देवदूत की स्वीकृति सभी शाखाओं में कैनोनिकल(canonical) नहीं है ।

हिब्रू के मान्यता के अनुसार गेब्रियल, ‘गेब्री’एल(Gavri’el)’ का मतलब “भगवान मेरी शक्ति है”, प्राचीन ग्रीक, कॉप्टिक, अरामाईक और अब्राहमिक धर्मों में, गेब्रियल एक महादूत है जो आम तौर पर भगवान के दूत के रूप में कार्य करता है । यहूदी ग्रंथों में, गेब्रियल अपने दृष्टान्तों को समझाने के लिए पैगंबर दानिय्येल(Daniel) को प्रकट करता है (दानिय्येल 8: 15-26, 9: 21-27) । गेब्रियल महादूत भी अन्य प्राचीन यहूदी लेखनों में एक चरित्र है जैसे कि एनोक की किताब (Book of Enoch) में ।

क्रिस्टियन न्यू टेस्टामेंट के “लूक की गॉस्पेल(Gospel of Luke)” में, देवदूत गेब्रियल जकर्याह(Zechariah) और वर्जिन मैरी के सामने दिखाई देते है, जो क्रमशः जॉन द बैपटिस्ट और यीशु के जन्म की भविष्यवाणी करते है (ल्यूक 1: 11-38)। एंग्लिकन, पूर्वी रूढ़िवादी और रोमन कैथोलिक समेत कई ईसाई परंपराओं में, गेब्रियल को संत के रूप में भी जाना जाता है । इस्लाम में, गेब्रियल एक महादूत है जिसे भगवान(Allah) ने मुहम्मद समेत विभिन्न भविष्यद्वक्ताओं/नबी(prophets) के प्रकाशन केलिए भेजा था । मुसलमानों का मानना है कि,  कुरान के 96 वें अध्याय के पहले 5 छंद, गेब्रियल द्वारा मुहम्मद को प्रकट किए गए ।

क्यों की भगवान विश्वासियों के मान्यता के अनुसार आदमी मरने के बाद ही स्वर्ग जाता है, जिन्दा होते हुए कोई स्वर्ग के लोगों का साथ बातचित करना क्या आपको तार्किक लगता है? जो कुछ क्रियासील है लोगों की मानना है की उसमे आत्मा है; अबतो कार, टीवी जैसे साधन या कंप्यूटर को भी लेलो या रॉबर्ट सब क्रियाशील है क्या उनमे आत्मा बसते हैं? तो वह फिर कैसे काम करते है? उनके डेस्ट्रक्शन के बाद उनकी आत्मा भटकती होगी या वह भी स्वर्ग और नर्क जाते होंगे? सायद जिस टीवी में ज्यादा भगवान की सिरिएल और प्रवचन दिखे गए होंगे वह सब स्वर्ग जायेंगे और जिस में पॉर्न(porns) और ब्लू पिक्चर्स दिखे गए होंगे वह सब नर्क । अगर एक इंसान मरने का बाद ही स्वर्ग या नर्क जाता है तो वह कौनसा पहला इंसान है जो मरने के बाद फिरसे जिन्दा होकर कहा की में स्वर्ग या नर्क से होकर आया हूँ? क्यों की स्वर्ग हो या नर्क का जानकरि केलिए मरना जरुरी है, इसलिए स्वर्ग या नर्क का पूर्ति कोई भी नहीं कर सकता; इसलिए ये एक सफ़ेद झूठ है । अगर मान भी लेते आत्मा दीखता नहीं जैसे मरे हुए आदमी एक जड़ है और जब वह जिन्दा था उसका अंदर आत्मा था और वही आत्मा स्वर्ग जाता है; क्या वह सरीर के साथ जाता है? यहाँ पर में आप को साफ़ साफ़ बता दूँ आत्मा फात्मा कुछ नहीं होता हर स्पेसिस एक बायोलॉजिकल एंटिटी ही होता है जो पानी और खाना से चलता है या साँस यानी हवा पानी और खाना से चलता है, पानी, साँस और खाना बंद करदो बायोलॉजिकल एंटिटी खुद बा खुद बंद हो जायेगा यानि उसकी डेथ हो जाएगी; इसमें से किसी एक को लम्बे समय तक बंद करदो उसकी भी मौत तय है; अगर आपकी भगवान भी इन चीजों में चलता है उसकी भी अगर ये बंद कर दिया जाये वह भी मर जाएंगे कोई चमत्कार उन्हें बचा नहीं सकता; भगवान की भगवान भी उससे बचा नहीं सकता । आज तक कभी आपने स्वर्ग में बशने वाले लोगों के साथ जिन्दा इंसान बात करते कभी सुना है? स्वर्ग और नर्क एक सबसे गन्दी झूठ है । मान्यता के अनुसार आपके किये हुए अच्छे या बुरे कर्म तय करते हैं उसकी आत्मा स्वर्ग जायेगा या नर्क । यहां साफ़ साफ़ कहा गया है की जो धर्म स्वर्ग या नर्क में विस्वाश करते हैं बस आदमी का आत्मा ही स्वर्ग या नर्क जाता है । यहीं लोगों की तर्क अंधापन है, वह है आत्मा । कभी किसीने आत्मा देखि है? अपने कभी दूसरे जानवर जो हमारे आसपास रहते हैं उनकी आत्मा देखि है? जिव जबतक जिन्दा है तबतक वह सोच सकता है और कुछ भी क्रिया कर सकता है जब मरजाये तो ना वह सोच सकता है ना कोई क्रिया कर सकता है । मरने के बाद उसकी कोई भी इन्द्रिय यानि सेंसेस(senses) काम नहीं करता; अगर इन्द्रिय यानि सेंसेस(senses) काम ही नहीं करेंगे तो उसकी सरीर को पीड़ा हो या इन्द्रिय आनंद (pain and pleasure) कभी भी अनुभव यानि फील कर ही नहीं पायेगा । जब आदमी मरता है तो उनके मान्यता के अनुसार आत्मा स्वर्ग या नर्क जाता है सरीर नहीं; तो नर्क में तेल की कढ़ाई में फ्राई हो या परियों के साथ प्रणय हो उसकी पीड़ा या इन्द्रिय आनंद केलिए जब आपकी इन्द्रियां ही नहीं होंगे तो आप को जो भी मिले उससे आपको कोई फर्क नहीं पड़ेगा इसलिए इसको मानने वाले तर्क अंध और बेवकूफ है । अगर आप अच्छा सोचते हो अच्छा कर्म करते हो जिससे आप आपके साथ साथ दूसरों की जीवन में खुशियां लाते हो वही असली स्वर्ग है अगर आपकी बुरे कर्म खुदकी जिंदगी को दुख देनेका साथ साथ दूसरों को भी दुख दे तो वह नर्क है । अच्छे सोच और अच्छी कर्म यानी सत् कर्म  ही असली धर्म है; ना की अंधविश्वास, अज्ञानता, आपराधिक हिंसा, गंदी और संकीर्णता इत्यादि बुरे सोच और कुकर्म करके भगवान के नाम पे माफ़ी मांगो या भगवान के नामपे कुकर्म करते चलो वह धर्म है; दरअसल वै धर्म नहीं कुकर्म और कुधर्म है । भगवान धार्मिक होनेसे अच्छा एक अच्छी इंसान होना काफी है । असलियत में स्वर्ग और नर्क सबसे बड़ा झूठ और धोका है । अगर स्वर्ग और नर्क ही नहीं भगवान के दूत कहां से पैदा होंगे? इसलिए भगवान की दूत की पहचान(identity) भी सफ़ेद झूठ है । इसलिए गेब्रियल पहचान ही झूठ है । कहना का मतलब गेब्रियल के नाम पे कहे गए सभी तथ्य उनके नाम पे लेकर कहागया; इसका मतलब क़ुरान मुहम्मद की खुदकी बनाई गयी सोच है अल्लाह की नहीं । अगर गेब्रियल अल्लाह की दूत थे तो ये साफ़ है की मुहम्मद ने गेब्रियल के नाम पर सफ़ेद झूठ बोला, या अगर सच में मुहम्मद ने  गेब्रियल देखि तो वह मोनोबिज्ञान के हिसाब से मानसिक बीमार थे; क्यों के आदमीको जब अनजान लोगों की बातें सुनाई देता है जिसको उसके सिवा किसी और को दिखाई नहीं देता वह एक तरह की मानसिक बीमारी है; मोनोबिज्ञान के हिसाब से जब कोई एंटिटी को किसी एक ब्यक्ति ही उसको सुन सके और देख सके जिसका कोई फिजिकल एक्सिस्टेंस ही न हो उसको मानसिक बिकृति कहते है ।

प्रोफेट मुहम्मद 570AD में पैदा हुए और जब उनको ४० साल हुआ तो वह अपनी बनायीं गयी धर्म की और मोड़े । उन्होंने चालिश की उम्र में “हिरा के गुफा” में अल्लाह की दूत गेब्रियल से बात किया करते थे जिससे की इस्लाम धर्म पैदा हुआ । इसका मतलब चालीस साल तक वह गैर मुस्लिम थे और काबा की ३६० मुर्तिबाद की अनुयाई थे जिसको उन्होंने इस्लाम बनने का बाद 630AD में तोडा  । अगर इस्लाम हिरा की गुफा में पैदा हुआ तो वहां इस्लाम की पहचान होना चाहिए ना की जहाँ ३६० मूर्त्तियों को ध्वश्त किया गया वह काबा में होना चाहीये । प्रोफेट मुहम्मद ने आपने पूर्वजों का आस्थाओं की हत्या किया था । अगर आप प्रोफेट मुहम्मद की जीवनी पढ़ेंगे, तो आप को साफ़ साफ़ पता चल जायेगा जब वह गैर मुस्लमान थे (40years) तब वह कोई भी हिंसा नहीं किया; लेकिन मुस्लमान यानि अपनी बनाईगई इस्लाम धर्म बनाने का बाद वह बाकि के २२ साल as a Muslim अल्लाह की नाम पर हिंसा और कई तरह की अपराध किये । ना प्रोफेट मुहम्मद की माता पिता  अमीना और अब्दुल्लाह मुस्लिम थे ना उनकी दादा जी और मामा  अब्दुल-मुत्तलिब और अबू तालिब मुस्लिम थे; ये भी कंट्रोवर्सी है मुहम्मद अपने बापकी नहीं दादाजी अब्दुल-मुत्तलिब की बेटे थे । इण्डिया में जिन मुगलों ने इस्लाम ज्यादा फैलाई उनके पूर्वज जंगहिस खान और उनके बेटे ओगेडेइ खान, जोचि खान, तोलुइ और चगताई खान मुस्लिम नहीं थे बल्कि टेंगरिजिम का अनुयायी थे । जंगहिस खान(Genghis Khan) सीधे यहूदी और मुस्लिम को अपना दास कहा । चागताई खान के वंशधर इस्लाम कबुली और उनके वंशज ही इंडिया में इस्लाम को ज्यादा फैलाया जब की ओगेडेइ खान की कोडेन यानि गोदान खान और कुबुलाई खान बौद्ध धर्म अपनाया और चीन में उसकी प्रसार किया । प्रोफेट मुहम्मद को अपने कुकर्म की सजा मिली और इस्लाम स्कोलार शेख यासेर अल-हबीब के अनुसार वह अपने प्यारी बीवियां आइसा और हप्सा जिन के पिता अबू बक्र और उमर थे, जो प्रोफेट मुहम्मद की दोस्त और ससुर भी थे उनकी हत्या की साजिस रची और जेहेर देकर मार डाला; इसलिए वह कोई ज्यूस(Jews) औरत से नहीं मरे, बल्कि अपने ही करीबी लोगों के द्वारा हत्या किये गये ।

अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन का “डायग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैन्युअल ऑफ़ मेन्टल डिसऑर्डर्स (डी.एसएम्) Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders (DSM)” के अनुसार प्रोफेट मुहम्मद को कई तरह की मानसिक बीमारी थी । उन्होंने २५ साल की उम्र में आपने से १५ साल बड़ी ४० साल की औरत खादिजा(Khadijah) से सादी किया जो की  “डी.एस.एम्” के अनुसार अनिलीलाग्निआ (Anililagnia) मानसिक बिकृति है । ४० साल की उम्र में उनको हिरा की गुफा में angel Gabriel यानि महादूत गेब्रियल दिखाई देते थे जिसने अल्लाह और इस्लाम के बारे में मुहम्मद को बताया जो आज तक मुहम्मद के सिबा किसी और को दिखाई नहीं दिया ना कभी दिखाई देगा जो की एक भ्रम की बीमारी है और साइकियाट्रि में इसको स्किज़ोफ्रेनिआ (Schizophrenia) कहते हैं । पहले बीवी खादिजा मरने के बाद उनहोंने कई औरत से सादी किया कुछ इस्लामिक स्कोलार जैसे अली दश्ती ३० से ज्यादा बीवी होने का दावा करते हैं । मुहम्मद की सबसे छोटी उम्र की बीवी आइशा(Aisha) थी; जब मुहम्मद 52 वर्ष के थे तब उसे केवल 6 साल की उम्र में मंगनी हो गई और 8 से 9 साल की उम्र में विवाह को समाप्त कर दिया गया । इतनी कम उम्र की लड़की से सेक्सुअल आकर्षण को डी.एस.एम् में पेडोफिलिआ(Pedophilia) बिकृति कहाजाता है । प्रोफेट मुहम्मद ने आपने पूर्वजों का आस्थाओं की हत्या किया था; आपने धर्म को फ़ैलाने केलिए उन्होंने आपने कबीले की नरसंहार की जो की एक आपराधिक कृत्य है और साइकियाट्रिक में इसको ASPD यानि  Antisocial personality disorder अर्थात असामाजिक व्यक्तित्व विकार कहते हैं । उन्होंने आपनी आंटी की लास के साथ सेक्स किया जो की डी.एस.एम् की पाराफिलिआ(paraphilia) के अनुसार नेक्रोफिलिआ (Necrophilia) मानसिक बिकृति है । मोहम्मद ने अपने बेटे की पत्नी जैनब के साथ शादी भी कीया था । कुरान के मुताबिक, मुहम्मद अशिक्षित भी थे । इस तरह अगर आप गिनते जाओगे तो प्रोफेट मुहम्मद पैगम्बर कम मानसिक बिकृत ज्यादा लगेंगे ।

इस लेख का ये उद्देस्य है की इंडियन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में पाए जानेवाले ९७% से ज्यादा मुसलमान इस भूखंड का ही मूल निवासी है । जिनके मातृभाषा कभी, अब वे जिस जमीं से जुड़े हुए है और अगर उनकी पूर्वज कभी खंडित भूखंड को विस्थापित नहीं हुए थे उसी भाषीय सभ्यता की ही मूलनिवासी हैं जो 700AD के बाद इस्लाम जब इस भूखंड में आया उसके बाद इस्लाम धर्म को कई कारणों केलिए कबुली है । इसका मतलब गुजरात में दिखने वाले मुसलमान गुजराती भाषिय सभ्यता से हैं और महाराष्ट्र में दिखने वाले मुस्लिम मराठी हैं इत्यादि इत्यादि । समय के साथ इस विशाल भूखंड कई धर्म के चपेट में आया और यहाँ के मूलनिवासी उसी धर्म के चपेट में घुलते गए; 263BC से 185BC तक यहांकी प्रमुख धर्म बुद्धिजीम था । 185BC के बाद वर्णवाद यानि वैदिक धर्म के चपेट मैं आया और यहाँ की मूलनिवासी चार वर्ण में बंट गए । ब्राह्मणबाद बौद्ध धर्म को अपभ्रंस और ख़तम करनेकी कोई कसर नहीं छोड़ी । जब 33AD में ईसाई धर्म पैदा हुआ इंडिया में उसकी प्रसार कुछ भी नहीं था क्यों की कोई इस धर्म को जोर जबरदस्ती या प्रलोभन दिखाके इम्प्लीमेंट करने की कोसिस नहीं की; लेकिन 700AD के बाद जब इस्लाम इस भूखंड में आया ये ज्यादा फैला और इस भूखंड का सेकंड मेजर धर्म बनगया । वर्ण बाद के वजह से कई भाषिय सभ्यता चार वर्ण में बंट ने कारण शूद्र का बर्ग ज्यादा बनगया था । मनुवाद यानि वैदिक चार वर्ण की हिसाब से पुजारी, राजा और ब्योपारी की संख्या गैर पुजारी, गैर राजा और गैर ब्यापारियों बृत्ति से बहुत कम थी; धूर्त वर्णवादियों ने पुजारी, राजा और ब्योपारी को अगड़ी बर्ग बना डाला और वर्किंग यानि श्रमिक श्रेणी को शूद्र यानि अगड़ी बर्ग का गुलाम यानि पिछड़ी वर्ग बना डाला जिसे की शूद्र यानि पिछड़ी वर्ग कभी अगड़ी बर्ग बन न पाये इसलिए नाम के पीछे उनके बृत्ति के सरनेम लगाके बृत्ति की सरंक्षण की और फ्रीडम ऑफ़ प्रोफेशन को ब्यान किया । शूद्र की प्रोटेस्ट को दबाया गया इसलिए ज़्यदातर शूद्र ही इस्लाम कबुल लिया, इसका मतलब ये नहीं की दूसरे वर्ण या अन्य धर्म मानने वाले लोग इस्लाम कबुली नहीं होगी । कुछ मुस्लमान राजाओं ने जबरदस्ती मूलनिवासियों को मुसलमान भी बनाया । ३% से भी कम invader मुस्लिम्स ज्यादातर आपने देश नहीं लौटे और यहाँ बस गए; इसका मतलब इस भूखंड की संकरीकरण से उनकी सत्ता इस भूखंड में ही विलीन हो गया लेकिन उनकी लायी गयी धर्म आज तक एक बड़ी प्रॉब्लम हो गयी है जिसके वजह से अखंड भूखंड तीन भूखंड में यानि पाकिस्तान, इंडिया और बांग्लादेश में बंट गया ।  यहाँ के लोग इतनी मुर्ख है की उनकी साधारण ज्ञान ही नहीं । क्या कोई आरबीक लोग जिन्होंने इस्लाम धर्म बनाई कभी उर्दू या हिंदी में बात करते देखा है? या बांग्लादेश की मुसलमानों का क्या इतना ज्ञान नहीं अरब में कोई बंगाली में बात नहीं करता? अगर उनको आपकी मातृ भाषा की इल्म ही नहीं आप लोग अरबी भाषा की इतने भूखे क्यों हो? अगर कोई भगवान है उसको केवल आरबिक या संस्कृत भाषा ही क्यों पसंद है? किसी भगवान को आरबिक या संस्कृत भाषा में संबाद करने के पीछे राज क्या है? अगर आपकी भगवान केवल आरबी जानता हो तो क्या ग्यारंटी है गैर आरबिक भाषा वाले मुसलमानों की बात वह समझ पा रहा होगा? मुसलमान आपने ही भाषा में नमाज क्यों नहीं पढ़ते? गूगल ट्रांसलेटर भी आरबिक से दूसरे लैंग्वेज को ट्रांसलेट करलेता है; बंगाली मुस्लिम बंगाली में नमाज़ नहीं पढ़के आरबीक में पढ़ने का क्या जरुरत? इसका मतलब साफ़ है की उनके पूर्वज कभी social existence केलिए धर्म को जबरन कबूला था आपने स्व इच्छासे नहीं; तो इस्लाम केलिए इतना कट्टरपंथी क्यों? क्या ये एक पागलपन या मानसिक विकृति नहीं है? इससे ये साबित हो जाता है की गैर आरबिक भाषीय लोग बस आरबिक सोच यानि इस्लाम को आपने सोसियल एक्जीस्टेंस केलिए बिकल्प की तौर पर चुना था। ये भी सच है एक धर्म के साथ दूसरे धर्म की मत भेद रहता है और उसकी रिजल्ट हिंसा से भी होता है यानि दंगे, झगडे और मौत एक आम बात है । ये झगडे इसलिए होते हैं की उनके स्क्रिप्चर उनके दिमाग को कट्टर बनाता है; स्क्रिप्चर के सब्द उनको ये करने में प्रेरणा या मजबूर करते हैं । जो धर्म बनाये थे उनकी अब एक्जीस्टेंस नहीं है; सीबाये उनके सोच के, उनकी भगवान की तो पता नहीं क्यों की रियल वर्ल्ड की झगडे में किसीके भगवान उनको बचाने नहीं आते; तो एक सोच जो एक जेनेरेशन से दूसरे जेनेरेशन को ट्रांसफर होता है जो की रिसाईटेसन के मध्यमसे हो या किसी और तरह की कम्युनिकेशन की माध्यमसे हो, वह ही इस सब सामाजिक इविल्स(evils) का जड़ होता है । और इस सोच को रन करनेवाले ही असली गुनेहगार होते हैं । क्यों की इस्लाम एक बार कबूलनेके बाद उससे निकलना मुश्किल है यानी अपोस्टसी और कन्वर्शन के लिए सजाए मौत है ये एक तरह की सोच की ट्रैप ही है । जो एक बार इसका चंगुल में फंसा उससे निकलना नामुमकिन की बराबर ही है जिसलिये अब तक हमारे ही भूखंड के ज्यादातर मूलनिवासी वैदिक ट्रैप से बचने के लिए इस्लाम ट्रेप में 700AD से आज तक फंसे हुए हैं । और कुरान की कट्टर सोच उनकी दिमाग को नियंत्रण करता आ रहा है । नागरी/नगरी भाषा(नगर की भाषा) को वैदिक वाले “देव ‘ नागरी=देवनागरी” बना डाला और इस्लाम आनेका बाद इसका नामकारण “हिंदी” हो गया; इस्लाम राजाओं ने इसके साथ कुछ पर्शियन और आरबीक सब्द मिलाके इसका नाम उर्दू रखा दिया और इसके लिपि को आरबीक लेटर्स से प्रेरित होकर बना डाला और मदरसे के माध्यमसे हर भाषिय सभ्यता की मुसलमानों की भाषा उर्दू बना दिया ।

अगर इंसान की मौत कोई बीमारिसे होता है उसकी कारण डिस्फंक्शन ऑफ़ ऑर्गन्स (dysfunction of organs) या वाइरस(virus) या बैक्टीरिया(bacteria) जैसे चीज उसके कारण होता है; वेसे ही अगर एक सोच सामाजिक बुराइयां या इविल्स का कारण हो जाता है, और तो और मौत की कारण भी होता है, इसके पीछे जो सोच या मानसिकता इसका कारण है उसको हम क्यों उस मौत या सामाजिक बुराइयां का कारण नहीं मानेंगे? जैसे बीमारी का कारण होता है, वेसे ही जिस सोच की बजह उनके अंध भगवान प्रेम है, उसको हम एक बीमारी क्यों नहीं कह सकते? इसलिए थेओ(Theo) यानि गॉड/गॉडस यानि भगवान या भगवान से संबधित, और फिलिआ(philia) यानि एब्नार्मल(abnormal) लव तथा अंधा प्रेम जिसका कोई कारण या कारण होना जरूरी नहीं है जिसको हम थीओफिलिआ(Theophilia) बीमारी कह सकते हैं । थीओफिलिआ (Theophilia) का मतलब भगवान की सोच से उत्पन्न मानसिक विकृति है; जिसका जागरूकता(awareness) लोगों को होना चाहिए जो की मानवता के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक मानसिक बीमारी है । यहां की बहु भाषीय मुलनिवाशी जिनलोगों की पूर्वजों ने 700AD के बाद इस्लाम अपनाया इनका आरब भूखंड से कोई रिश्ता नहीं लेकिन यहाँ पैदा हुए हर बच्चे के दिमाग में उनके स्क्रिप्चर में लिखे गए एंटिटी की बाईओलॉजिकल काल्पनिक एंटिटी उनके दिमाग के अंदर पीढ़ी दर पीढ़ी सम्बाद के माध्यम से पैदा किया जाता है और उस एंटिटी के साथ सेंटीमेंटल और इमोशनल सम्बद्ध पैदा किये जाते हैं जो की असलियत में एक्जिस्ट ही नहीं करता और उसकी सेंटीमेंटल डिस्टर्बैंसेस से वह रियेक्ट और इन्टॉलरेंट भी हो जाता है, यही है थीओफिलिआ की असली लक्षण यानी जो एक्जिस्ट ही नहीं करता उसकेलिये लोग मरने और मारने पर उतर आते हैं; इसको हम पागलपन या मानसिक विकृति नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? इसको हम भगवान की लत (God Addiction) भी कह सकते हैं । क्यों की ३ मेजर रिलिजियन ईसाई, इस्लाम और हिन्दुइजम मानव जाति और मानवता को विभाजन करते आ रहे है, और बिना परिसीमा के एक एक तरह की धर्म की साम्राज्य चला रहे है; जो की भविष्य में अपने भीड़(crowd) बढ़ाने की चक्कर में एक दूसरे से लड़ कर मानव दौड़(Mankind) का विनाश की कारण बन सकते हैं ।

धर्म की लड़ाई करने से पहले इन लोगों की उनकी धर्म की बेसिक्स तो पता होना चाहिए? लेकिन उनको बेसिक तो पता नहीं आपने धर्म की लिखी ज्ञान की पांडित्य दिखाते फिरते हैं । धर्म के वजह से हमारा भूखंड हमेशा पिछड़ा रहा और अगर इन अंधे भक्तों का आँख ना खुले, सदियों पिछड़ा ही रहेगा । थीओफिलिआ (Theophilia) यानी God Addiction अर्थात भगवान की लत के कारण धर्म से जुड़ी आतंकवाद और अतिवाद (extremism) पैदा होता  है जो की मानबता के लिए खतरा है । वेबसाइट का काम सोये हूए को जगाना है, अगर आप जागतेहुए सोया हो तो आप सोसिओपैथ हो और समाज केलिए सबसे ज्यादा खतरनाक हो जिसकी निदान या खात्मा जरुरी है ।

NB: यदि आपको कोई टाइपिंग और व्याकरण संबंधी गलतियां मिलती हैं तो इसे स्वयं सही करें । (If you found any typing and grammatical mistakes correct it yourself.)

आप को एक अनुरोध है; आप ईस्वर विश्वासी यानी ईस्वर आस्तिक बनने से अच्छा स्वस्तिक/स्वास्तिक(स्व+आस्तिक)  बने यानी आपने आप पर विश्वास करे; आपने दिमाग की मालिक आप खुद ही बने, न की किसी एक काल्पनिक एंटिटी के नाम पर दूसरों को अपने दिमाग को कंट्रोल करने दें, जो लोग खुद की और अपने संगठित लाभ के लिए उनके अनुनायियों की मानसिक स्वास्थ्य का परवा नहीं करते और उनको सदियों मुर्ख और तर्क अंध बनाये रखकर अपने स्वार्थ के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहते हैं । जो इस्लाम धर्म क़बूली हैं 610AD से पहले वह सब गैर-इसलामी थे; वैसे प्रोफेट मुहम्मद भी 610AD से पहले मुस्लिम नहीं थे । इंडिया में जो इस्लाम अनुयायी दीखते हैं उनके पूर्वज 700AD से पहले गैर इस्लाम ही थे । क्यों की वह अब इसलामी है, उनके दिमाग  को अल्लाह की एंटिटी से कंट्रोल किया जाता है; अगर इस्लाम धर्म मानने वाला ईसाई धर्म क़बूल लें, तो यीशु के नाम पे दिमाग को कंट्रोल किया जायेगा; अगर हिन्दू धर्म अपना लें तो ३३ करोड़ भगवान के नाम पे उनके दिमाग को कंट्रोल किया जायेगा यानी कुछ लोग हैं जो की भगवान के नाम पे उन की  दिमाग को कंट्रोल करना चाहते है; और जो भी धर्म आप अपनाए आप अपनी नहीं उनके दिमाग की दिखाई गए रास्ते पे चलते है; इसलिए उनके गुलाम हैं भगवान की नहीं; भगवान की नाम एक माध्यम है । आप जो भी धर्म अपना लें  आपकी दिमाग उनका गुलाम ही रहेगा और उनकी कही गयी रास्ते पे आप चलोगे; धर्म परिवर्तन से बस अपने दिमाग कंट्रोल करने वाले मालिक बदलते हैं  । इसलिए धर्म एक तरह की स्पिरिचुअल स्लेवरी(Spiritual Slavery) है । हर धर्म इंसान की दिमागों को भगवान के नाम पे गुलाम करने का तरीका है जिससे धर्म की मैनेजर्स यानी धर्म को चलाने वाले अपने बनाया गया भीड़ से तरह तरह की संगठित लाभ उठाते हैं । कोई भी धर्म के बनाने वाले और उनको चलानेवाले हमेशा सोसिअल कनफेरमिटी (Conformity) को अपने स्वार्थ के लिए गलत इस्तेमाल किया है । इसलिए कृपया आप खुद ही खुद की दिमाग की मालिक बने । आप की आस्था किसी काल्पनिक एंटिटी के ऊपर नहीं सत्य, ज्ञान और विज्ञान यानी सद् बुद्धि, तर्क, प्रेम, करुणा, सेवा, अहिंसा, मानवता और स्वस्थ जीवनके ऊपर होना चाहिए । आपने बल और बुद्धि को हिंसा में अपने सुरक्षा के लिए हि उपयोग करे न की किसी दूसरे के नुकसान के लिए । सरल अर्थ में, जब आप अपना बल और बुद्धि अपने सुरक्षा या जीने की संघर्ष के लिए इस्तेमाल करते हो उस को सेल्फ एक्जिस्टेन्स और सेल्फ डिफेंस यानी आत्मरक्षा कहते हैं लेकिन जब वही बल और बुद्धि आप अपने लोभ, क्रोध, ईर्सा या अपने स्वार्थ के कारण खुद को और दूसरों को हानि पहुँचा ने के लिए करते हो उस को अपराध कहते हैं । अपना जीवन की सुरक्षा एक प्राकृतिक अधिकार है इस के लिए किसी किताब में लिखी नैतिकता, किसी ज्ञानी से या गुरु से कहा गया नैतिकता या किसी देश की नियम को जानना जरूरी नहीं । और जहाँ तक भगवान की बात है, आप की पूर्वज न कभी भगवान को देखे थे, न आप अपने जीवित रहते देख पाएंगे , ना भविष्य में आप के पीढ़ियां कभी भगवान को देख पाएंगे, ये जरूर है अगर आप की आस्था सांइंस एंड रीजनिंग में हो उस को एक दिन ढूंढ पाएंगे ये सच है या गलत है और उसको समझ पाएंगे । एक दिन सच जान ने का वाद भी आप ये फेथ, आप छोड़ नहीं पायंगे क्यों की ये फेथ एक दिन में आप की दिमाग में नहीं बना इसलिए जो अंधविश्वास अभ्यास में परिवर्तित हो जाये उससे छोड़ना इतना आसान नहीं होता जो की थीओफिलिआ का लक्षण है । प्रोफेट मुहम्मद ने एंजेल गेब्रियल/जिब्राइल को देखा था इसका कोई प्रमाण नहीं, वह कैसे दीखते थे उसका भी कोई कुरान में लेख नहीं; गेब्रियल/जिब्राइल अल्लाह की वारे में कुछ भी वैसे विस्तार जानकारी नहीं दी  बस कहा अल्लाह ही एक भगवान है जो दीखता नहीं पर है, और सबसे बड़ा ताक़तवर है जो दुनिया बनाया और दुनिया का रखवाला है । गेब्रियल/जिब्राइल को प्रोफेट मुहम्मद दिख गए की मुझे इस इंसान को अल्लाह की वारे में कहना है लेकिन जिसके वारे में कहा वह अल्लाह क्यों नहीं दिखा? अगर नहीं दिखा तो गेब्रियल/जिब्राइल को कैसे पता चला की अल्लाह है? कुछ देर के लिए मान भी लेते हैं जैसे अंधा आदमी अहसास कर सकता है लेकिन देख नहीं पाता वैसे गेब्रियल/जिब्राइल कभी नहीं कहा के इस इस कारण से उनको पाता चला या अहसास हुआ के अल्लाह का एक्जिस्टेन्स इस कारण से पता चला । ये अहसास ठीक उसी तरह की है जैसे किसी इंसान को एक काली रात में एक काली बिल्ली का अहसास होना जो की जन्मजात से अंधा और बहरा है, जिसने ना कभी काली बिल्ली को देखा है ना उसकी आवाज सुनी है फिर भी उस को उसकी अहसास है । अगर अल्लाह एक एंटिटी नहीं है लोग हज करने काबा क्यों जाते हैं और काबा के सामने सर झुका ने के पीछे क्या लॉजिक हैं?  प्रोफेट मुहम्मद के क्या क्या ऐसे अच्छे गुण थे जो अल्लाह ने उनको ही अपने वारे में बोलने के लिए चुना? चालिस साल तक तो वह कोई संत या भक्त होने का कोई पुख़्ता प्रमाण आपको नहीं मिलेगा । वैसे कहने को हम कुछ भी कह सकते है । हम ये भी कह सकते यूनिवर्स या जो भी कुछ देखते हो, अहसास करते हो ये सब एक मेंढक/कुत्ता/बिल्ली… ने बनाया जो सबसे बड़ा ताक़तवर है, जो सर्वव्यापी है कोई इससे देख नहीं सकता, उस को बस अहसास कर सकते हो, जिसका रूप भी नहीं है न आप उसकी वारे में कल्पना कर सकते हो, उनके वारे में जानना इंसान की दिमाग का बस में नहीं, वह सबसे दयालु,  सबसे बड़ा, सबसे शानदार, परम सत्य,  अनंत भगवान, पालन कर्त्ता, संहार कर्त्ता और  शांति का स्रोत है इत्यादि इत्यादि… जो की शब्द का सक्ति है जिससे कोई इंसानी दिमाग उस एंटिटी का अपने दिमाग में एक आयाम बना लेता है जो की इंसानी क्षमता है; इसका मतलब ये नहीं की वह एंटिटी रियलिटी में एक्सिस्ट करता है; हाँ ये जरूर है काल्पनिक एक्सिस्टेंस पैदा होजाता है । वैसे इंसान कितने काल्पनिक चरित्र बनाये जैसे स्पाइडर मैन, ही मैन, मिकी माउस इत्यादि इत्यादि लेकिन वह बस एक काल्पनिक चरित्र ही हैं । चरित्र काल्पनिक हो या असली उसकी हमेशा लोगों की दिमाग के ऊपर असर रहता है और आप जैसे असर डालने के लिए प्रोग्रामिंग करोगे  उसका असर भी लोगों की ऊपर वैसे होगा । यहाँ सोसिअल नर्म प्रोग्रामिंग (Social norms programming) करनेवला की नियत क्या है उस को आप को अहसास करना पड़ेगा, बद नियत वालों को आप को नकारना पड़ेगा नहीं तो बस धर्म के नाम पे आप को दुःख ही मिलेंगे । असली चरित्र यानी कोई चरित्र अगर एक दिन पैदा हुआ था और दुनिया के लिए उसकी कुछ सोच और ऐक्शन अच्छे या बुरा था वह मरने का वाद कल्पना के बराबर ही है । एक बार एक चरित्र कल्पना या मैमोरी हो जाये उस चरित्र सच हो या झूठ उसके किये गए नफरत या कुकर्म या गंदे और बुरे विचार को प्रमोट करना या आगे बढ़ाना हमेशा घातक ही होता है । दरअसल अल्लाह या हुब्बुल अरब के सबसे ज्यादा माने जाने वाले मूर्त्तिवाद पहचान थे । वक्किदी जैसे इतिहासकारों का मानना है मोहम्मद जब ताक़तवर बने अल्लाह वास्तव में अरब वासियों के मानाजानेवाला देवताओं में अरब की देवताओं का प्रमुख देवता थे । अल्लाह की पहचान प्रोफेट मुहम्मद से पहले था; मुहम्मद ने बस उस पहचान को अपने धर्म केलिए इस्तेमाल किया और मूर्त्तिवाद को उसमें से एलिमिनेट यानि खत्म कर दिया; यानी अपने धर्म केलिए वह अल्लाह की नाम या पहचान की इस्तेमाल किया जिसको हम आइडैंटिटी थेफ़्ट या पहचान की चोरी या डकैती भी कह सकते हैं । अपने धर्म केलिए प्रोफेट मुहम्मद ने अपने पूर्वजों की फ़ेथ सिस्टम को ध्वंस कर दिया ये आतंकवादी का काम नहीं तो क्या है? अगर आप की धर्म उनके फ़ेथ सिस्टम से अच्छा होता तो वह अपने मर्जी से इस्लाम क़बूल लेते जबरदस्ती थोपना ये कौन सा अच्छी कर्म है? इस्लाम को प्रोफेट मुहम्मद ने तलवार के दम पर और मृत्यु के भय दिखा के अपने ही लोगों के ऊपर पहले थोपा था, प्यार से नहीं, ये कौन सा पैगम्बर वाली बात है? ये पूरी तरह आतंकवादी वाला बात है; जैसे पुष्यमित्र शुंग ने तलवार और मृत्यु के भय दिखा के 185BC में वर्णवाद और वैदिक सोच इम्प्लीमेंट करके बौद्ध धर्म का ख़ात्मा किया था । अगर आप इस्लामी हो ये आपको क्रोधित कर सकता है लेकिन आप खुद को ये प्रश्न पूछना चाहिए  सच्चाई आप को क्रोधित करने के पीछे क्या राज है? जो की थीओफिलिआ की एक लक्षण है । प्रयोगसे पता चला है, जो थीओफिलिआ के शिकार हैं वह इस बीमारि से बचना मुश्किल है यानी नामुमकिन की बराबर है, क्यों के बचपन से ही परिवार से ये बीमारी दिमाग में प्लांट किया जाता है; लेकिन वह चाहे तो उनके आनेवाला पीढ़ियों को इस बीमारि से बचा सकते है, केवल उनके थीओफिलिआक सोच को दूसरे जेनेरेशन को ट्रांसफ़र न करें ।

उदाहरण के स्वरुप आप क्या बिना बिजली , बिना TV, और बिना इंटरनेट के जिंदगी जी सकते हो? अगर आप के जिंदगी में ५ घंटे का पावर कट शुरु हो जाये, इंटरनेट प्रोवाइडर ठीक से इंटरनेट सेवा नहीं दे, या कोई भी साधन जो आपके जिंदगी में अत्यावश्यक योगदान देता हो वह ठीक से काम न करे तो आप गुस्से में आ जाते हो यहाँ तक कुछ लोग जो कंपनी  TV बनाया, या जो बिजली और इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर है, उनकेलिए माँ बेहन की गाली भी दे देते है, लेकिन जो लोग बिजली, इंटरनेट और TV की रचना की थी यानी उनके आविष्कारक जैसे बिजली के आविष्कारक बेंजामिन फ्रेंक्लिन, TV के आविष्कारक जॉन लोगी बैयर्ड और फिलो फार्न्सवर्थ; और इंटरनेट का आविष्कारक  रोबर्ट इ.कहन और विन्ट सिर्फ के चरित्र या फॅमिली मेंबर के चरित्र के ऊपर कुछ भी कह दो आप की मुहं से कुछ भी नहीं निकलेंगे यहां तक भी ९०% से ज्यादा लोगों को उनके वारे में पता ही नहीं होगा, कहना के मतलब, जिनलोगों ने इंसान की जीने के नक्सा ही चेंज कर दिया उनको ज्यादातर लोग जानते तक नहीं; और उनके चरित्र के वारे में अगर उल्टा सीधा बोल दें आप उस स्थिति में कुछ नहीं कहेंगे; हो सकता है आप उसकी मजा भी लें; लेकिन धर्म को मानने वाले जैसे हिन्दुओं को राम, सीता या कृष्ण के वारे में या मुसलमानों को प्रोफेट मुहम्मद या अल्लाह की वारे में या ईसाई धर्म को मानने वालों को यीशु के वारे में कुछ उल्टा सीधा बोल दो तो भक्त लाल पीला हो जाता है और मरने और मारने तक भी बात चली जाती है, जिसको ना उनके पूर्वज देखे थे ना उनकी मूर्ति या स्मृति के सिवा उनका कोई अस्तित्व  है, जिसमें ज्यादातर काल्पनिक चरित्र ही हैं, फिर भी उन एंटिटी को वह इतना प्यार करते है की उनकी बदनामी उनसे बर्दाश्त नहीं होता है; भक्त ये भी भूल जाते है की उनके मान्यता का हिसाब से वह अगर सब भगवान हैं, जो सर्व व्यापी और महा शक्तिमान हैं; और, जो उनको गाली देगा वह सर्व सक्तिमान भगवान उनको सजा देनेकी क्षमता रखते होंगे, लेकिन भक्त खुद ही अपने भगवान की भगवान बन के उनकी मान का रक्षा करना शुरु कर देता है जो की एक अंधा प्रेम है, ये वह अंधा प्रेम है जो उनकी सोच की लालन पालन से पैदा हुआ है; और ये सोच बचपन में ही जो जिस धर्म का भीड़ में पैदा हुआ है उसके दिमाग में प्लांट किया जाता है ताकि उसकी दिमाग को उस सोच से कंट्रोल किया जा सके इस अंधा भगवान प्रेम ही हिंसा करवाता है जिसको थिओफिलिआ कहते है; जो की एक अंध विश्वास से पैदा मानसिक विकृति है और समाज के लिए खतरनाक है ।  इस सोच को अनुनायियों की सोच में समय के साथ लालन पालन और बढ़ने के लिए स्पिरिचुअल होम्स, प्लेसेस, फेस्टिवल्स, स्क्रिप्चर्स, डिवोशनल गाने, पिक्चर, स्कल्पचर और मोटिवेशन जैसे माध्यम लिए जाते हैं । थिओफिलिआ के कारण इंसान की दिमाग पार्शियल इरेशनल बन जाता है, अज्ञानता का सीकर भी होता है, स्लो लॉजिकल थिंकर बन जाता है और उस में तर्क अंधापन भी पैदा होता है, धर्म की प्रेम डिस्क्रीमिनेशन यानी भेदभाव को पैदा करता है, थिओफिलिआ के वजह से वह धर्म बनानेवालों का झूठ की सीकर भी बनता है और धर्म को चलाने वाले कुछ स्वार्थी, मतलबी दुष्ट दिमाग स्वयंभू पंडित कई तरह की असामाजिक बुराई यानी एन्टीसोसिअल सोच और ऐक्शन उस में मिला के उनके स्वार्थ के लिए भीड़ और भक्त का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करते हैं ।  आप को बता दूँ थिओफिलिआ एक खतरनाक मानसिक बीमारी है और इस मानसिक विकृति से आप अपने आप को और आप की पीढ़ियों को बचाएँ । थिओफिलिआ के वारे में इंटरनेट में आप को ज्यादा कुछ नहीं मिलेंगे क्यों की ये रिसर्च ये लेख की लेखक का रीसर्च है । आप चाहे विश्वास करें या ना करें ये आप की तर्क और विश्वास के ऊपर निर्भर है, क्यों के थिओफिलिआ का वैरिफ़िकेशन मेथड इसमें बता दिया गया है जो आप खुद टेस्ट कर के उसकी रिजल्ट पा सकते हैं । थिओफिलिआ की पुष्टि और उसकी सहमति कोई प्रतिष्ठित रीसर्च संगठन की सर्टिफिकेट से नहीं  बल्कि आम आदमियों की सहमति से यानी सोसिअल कोन्फोर्मिटी से होना चाहिए ।

(सच्चाई के दुश्मन , इस्लाम की स्वयंभू ठेकेदार और दूकानदार इस वीडियो को डिलीट करदेने से पहले इसको डाउनलोड कर लें)

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cavehiraइस्लाम का असली जन्म स्थान गुफा हिरा है काबा नहीं । इस्लाम 610 AD में पैगंबर मुहम्मद के द्वारा माउंट हिरा की इस गुफा में पैदा हुआ था । काबा प्राचीन अरबों की धार्मिक जगह थी जहां 360 मूर्तियों की पूजा किया जाता था, जिस को प्रोफेट मुहम्मद ने अपने बनाये गए धर्म इस्लाम के लिए ध्वस्त किया था । इसीलिए हज करने के लिए अनुयायी माउंट हिरा की इस गुफा में जाना चाहिए ना की काबा । khans
खुद ही सोचो जंगहिस खान की बेटों का वंशज जो इस्लाम क़बूली थी उनका सभ्यता कैसे है, और जो वंशज बौद्ध धर्म अपनाया था अब चीन, जापान और साउथ कोरिया जैसे देश कहाँ है ?

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काबा की अंदर क्या है?

अल्लाह का अगर कोई आकार ही नहीं, तो काबा का अंदर की तीन खम्भा, उसमें झूलते हुए बर्तन और दीवार में लिखे लेख की आगे सर झुकाने का मतलब क्या है? ये क्या प्रतीकवाद के सामने सर झुकना नहीं है? वह प्रतीक मूर्ति हो या कुछ और, वह प्रतीक वस्तु या पदार्थ तो ही है? हज को करने के लिए शारीरिक और वित्तीय रूप से सक्षम होने की स्थिति को इस्तिताह(istita’ah)  कहा जाता है, और एक मुस्लिम जो इस स्थिति को पूरा करता है उसे मुस्ताती(mustati) कहा जाता है; मुसलमान मक्का में बस इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक को पूरा करने के लिए हज करने जाते हैं । इस्लाम के भक्त देश विदेश से कई रूपया खर्च करके काबा आते है और इन निर्जीव प्रतीक के सामने सर झुका के कैसे उनको अल्लाह की कृपा मिलता है वह लॉजिक और विज्ञान से बाहर है । दुनिया के सब मुस्लिम अनुयायी काबा की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ते हैं जब की सच्चाई ये है धरती फ्लाट नहीं है और क्यों की अर्थ गोल है वह सब स्पेस(space) की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ते हैं । और मान भी लियाजाये अर्थ समतल(flat) है और वह सब काबा के और मुंह करके अपने भगवान अल्लाह को अपना, अपने परिवार और मानवता की ख़ैरियत के लिए प्रार्थना करते हो, क्या काबा का अंदर की तीन खम्भा, उसमें झूलते हुए बर्तन और दीवार में लिखे लेख की आगे सर झुकाने से ये हासिल हो जाता है? क्या ये खुद को और अपने पीढ़ियों को अंधविश्वास की खाई और पीढ़ीगत मानसिक विकृति में  धकेलना  नहीं है? क्या ये अल्लाह की नाम से सोसिअल कन्फोर्मिटी के द्वारा पैदा मॉस हिस्टीरिया नहीं है? और एक बात, आम मुसलमानों को काबा की अंदर प्रबेश निषेध है यानि नामुमकिन की बराबर है; उसके अंदर बस अरब की प्रतिष्ठित रयाल फैमिली ही प्रवेश कर सकते हैं, आम मुसलमान नहीं; आम मुसलमान बस उसके चारों और घूमने की और उसके सामने सर झुकाने तक ही अनुमति है । तो अल्लाह क्या अमीर और गरीब मुसलमान, अरबी और गैर-अरबी का फर्क भी करता है? इंडिया में बसा हिन्दू हो या मुस्लिम थीओफीलीआ का इतनी सीवीअर सीकार हैं, आप अगर भगवान या अल्लाह के नाम पे उनको मल(feces) खाने को बोलेंगे तो व भी खा लेंगे; गालिगुलज, झगड़े, दंगा और जान लेना तो एक आम बात है । ना, रिग वेद का पुरुष सूक्त १०.९० के अनुसार पुरुष के वली से दुनिया और मनुष्य बन सकते हैं, ना कुरान की सूरए अल अलक़ (९६.२) के अनुसार इन्सान को जमे हुए ख़ून से पैदा किया जा सकता है, दो भी अवैज्ञानिकता, झूठ, भ्रम और मूर्खता की प्रचार करते हैं । धर्म प्रचारक और प्रसारक केवल उनके अनुयायीओंको बेवकूफ बना के ना केवल उनकी दिमाग को कंट्रोल करते हैं बल्कि अपने संगठित स्वार्थ के लिए उनकी शोषण और सियासी, सामाजिक, आर्थिक  फ़ायदा भी उठाते हैं ।

How Theophilia works, with an example.

Say the following story to a person saying “close your eyes and listen what I say, and try to visualize in your mind what I explain.” First copy and paste the following story in google translator in left hand side box. In the right hand side select any language that listener’s non-understandable language from the drop-down menu of different languages. Now try to read the translation or use text to speech speaker button to make it read automatically. For an example translate it in to “Polish” language for a Hindi speaking person that does not know Polish language. There will be speaker icon below the text window, click that speaker icon which will turn text to speech that you need not to read. If it reads fast, then  click again to read the text slowly so that listener can listen it perfectly. And try to make him feel the story and ask for his reaction. Again convert it in to is understandable language like Hindi and play the speaker button and get his reaction.

Story:

There was a beautiful pond in a jungle. Pond was surrounded by various of colorful flowers. Pond was even full of pink colored lotus. There were colorful butterflies flying here and there in that pond. Cuckoo were singing sweet songs. In that pond there was a very beautiful princess just had started to bath. She was fair, her eyes were large and attractive with colorful pupils & iris. Her body was very attractive with well-shaped breasts and hips. There were no clothes in her body when she was bathing. In the meanwhile, she listened a horse running sound that stopped near the pond. She saw a handsome man. He was so attractive & mannish. They started to stare each other.

Process results:

The story can create the imaginative characters and their actions in a human brain when they listen to this story with closed eyes, which has no real physical existence.If they can’t imagine say them to concentrate to imagine the characters and fee their actions still you get the success. You can create the visualization in their brain of your story and they can even feel the characters. Its how imaginative process works. If  they are told these characters were the real characters in the past they can even believe you blindly  if you hold a strong social authoritarian position to listener. If the same story is said to them in their non-understandable languages, they won’t be able to create the charters and their actions in their brain and even can’t feel the same except recognizing it as noise for their brain. It means, human brain understands the sounds that his brain knows its meaning which we often say language for communication; otherwise it’s a noise to human brain still they code meaning to it in their brain. On the basis of perceptive information our belief works. If information is verified according to their existence with proper perspectives, then human brain accepts it as valuable rational information. If information is logically not verified, then we take it as irrational which can’t be verified or there is no way exist to verify the information.  When irrational and non-verified information blindly accepted by humans believing it comes from our ancestors or from old origin which may be true or said by an individual which has a post of authority or individual of same kind who promoted the blind belief being a higher position of knowing the things more than to an ignorant pass only ignorance to its surrounding peoples. People even has their own level of logic and acceptance of information as they come across. So information plays different level of impact in their mind. It means we can create and even recreate the imaginative characters propagating the same story which characters has even no existence. I mean to say the Koran/Quran and Vedas are composed in Arabic & Sanskrit. If they are told to their followers in Arabic and Sanskrit they won’t be even realize their God if their mother tongue in not Arabic or Sanskrit or they don’t know the both the language. When it translated to their understandable language it creates the imaginative characters in their brain and same identity nursed for love and devotion in their brain. It means they love to an entity that has created by imagination and coded in bio-chemical form as biological storage in a human brain. This fake or imaginative love to the super power identity or God which has only men made imaginative bio-chemical form of existence as an entity in a human brain is called THEOPHILIA. THEO means God or related to God and PHILIA means abnormal love that needs an illogical reason or no reason why to love. Sociopaths use these kind of identities for their personal and organized benefits to control the followers mind or group of people with same beliefs through social conformity and ignorant mass follow them like cattle. This deviation should be considered as Mental deviation or disorder which is the root cause of many other social evils in our human race. Most of the root natives from Indian origin including Pakistan and Bangladesh those embraced Islam after 700AD has no connection with Arab in any kind without the acceptance of their set of thoughts i.e. Quran/Sharia but they think Arab is their origin. 99.99% of Islamic followers of this country can’t speak in Arabic but proud to learn Arabic because their faith system coded in Arabic. Its the part of the THEOPHILIA psychological disorder. They are logically so blind by God addiction or Theophila that they are even not capable to understand simple question i.e. if your God can’t understand your own language in first place then how it became your god? Why a God only understand just Arabic language without others? Why an old set of instructions made by some specific persons/jurists in the name of God and brand as religion should control your mind if something wrong in it? There was a time, people were without the phones. Then people used telephones. Now we use mobile phones. With the time lifestyle changes and even our used materials. Then why we should not change set of instructions for art of living or faith system according to our own requirements with the time? Living with set of irrational beliefs and delusions is one kind of partial psychotic disorder; and when this psychosis shared and practiced by mass its just mass hysteria. Those who claims they can see and feel the god; they are actually severely suffering from GDD(God Delusion Disorder) psychotic disorder.

 

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